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पृथ्वी की आंतरिक संरचना कैसी है /How is The Internal Structure of The erth-Indian Geography

पृथ्वी की आंतरिक संरचना कैसी है पृथ्वी की धरातलीय संरचना मुख्यरूप से पृथ्वी के अंदर होने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम है पृथ्वी की बाहरी एवं अंदर होने वाली प्रक्रियाएं पृथ्वी को आकार देती हैं इसलिए पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में जानना जरूरी है और पृथ्वी का निर्माण करने वाली भूपर्पटी से क्रोड तक सभी पदार्थ परत में बिभाजित हैं।  पृथ्वी की त्रिज्या 6370 किलोमीटर है और पृथ्वी की आंतरिक स्थिति के बारे में जानने के लिए विभिन्न स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है।  भूकंप -भूकंप एक प्राकृतिक घटना है जिसमे ऊर्जा निकलने के कारण तरंगें उत्पन्न होती हैं जो सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती हैं वह स्थान जहां से ऊर्जा निकलती है भूकंप का उद्गम केंद्र कहलाता है जिसे अवकेंद्र भी कहा जाता है। और तरंगे पृथ्वी के धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं अधिकेंद्र कहलाता है। और इसी स्थान पर भूकंप सबसे ज्यादा प्रभाव देखा  जाता है। भूकम्पीय तरंगें दो प्रकार की होती हैं p तरंगे s तरंगे धरातल पर सबसे पहले p तरंगें पहुँचती हैं और ये तरंगें गैस,तरल,ठोस तीनों पदार्थ से गुजर सकती हैं और s तरंगें धरातल पर कुछ देरी से पहुँचती हैं औ…
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पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई /How Did The Earth Originate - Indian Geography

पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई (How did the earth originate) पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में कोई एक मत नहीं है क्यूंकि विभिन्न दार्शनिकों एवं इसकी जानकारी रखने वालों ने अपने अपने विचार प्रस्तुत किये हैं जिसमे एक प्रारंभिक एवं लोकप्रिय मत जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट ने प्रस्तुत किया था जिसे निहारिका परिकल्पना के  नाम से  जाना जाता था।  आधुनिक सिद्धांत ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति के बारे में - आधुनिक समय में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के विषय में सर्वमान्य सिद्धांत बिग बैंग का सिद्धांत है जिसे विस्तारित ब्रह्मांड परिकल्पना भी कहा जाता है 1920 में एडविन हब्बल ने प्रमाण दिए की ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है आज से लगभग 13.7 अरब वर्ष पहले बिग बैंग की घटना हुई थी यानि की ब्रह्मांड में बिस्फोट हुआ था जोकि पृथ्वी सहित अन्य ग्रहों के निर्माण का कारण बना और ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है।  ग्रहों का निर्माण - तारे निहारिका के अंदर गैसों के झुंड हैं इन झुंडों में ग्रुत्वकर्षण बल से गैसीय बदल में क्रोड का निर्माण हुआ जिसके चारों ओर गैस एवं धूलकणों की तस्तरी का विकाश हुआ उसके बाद गैसीय बादल का संघनन सुरु ह…

भारतीय अपवाह तंत्र/Indian Drainage System Part 2-Indian geography

भारतीय अपवाह तंत्र (Indian drainage system) हमने भारतीय अपवाह तंत्र के पिछले भाग में हिमालयी नदियों का उल्लेख्य किया था मतलब जिनका उदगम हिमालय के किसी न किसी हिमनद से हुआ हो उसे हिमालयी नदियां कहा जाता है और इसमें बात करेंगे भारत के प्रायद्वीपीय नदियों की।  प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र - यहां पर उल्लेख्य करना जरूरी है की प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालय से पुराना है पश्चिमी तट के निकट स्थित पश्चिमी घाट बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में गिरने वाली नदियों के बीच जल विभाजक का कार्य करता है नर्मदा और तापी को छोड़कर अधिकतर नदियाँ पश्चिम से पूर्व बहती हैं वहीँ नर्मदा और तापी पूर्व से पश्चिम बहने के साथ भ्रंस घाटी में बहती हैं।  प्रायद्वीपीय नदी तंत्र  प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के अंतर्गत बहने वाली कई नदी तंत्र है पर यहां पर प्रमुख नदी तंत्रों का उल्लेख्य किया जा रहा है नदी तंत्र का मतलब होता है एक प्रमुख नदी और उसकी सहायक नदियाँ।
महानदी  महानदी का उदगम छत्तीशगढ़ के रायपुर जिले के निकट स्थित सिहावा से हुआ है जिसकी लम्बाई 851 किलोमीटर है जोकि तीन  राज्यों में बहती है मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ ,उड़ीसा।  गोदावरी…

भारतीय अपवाह तंत्र/Indian Drainage system-Indian Geography

भारतीय अपवाह तंत्र (Indian dranage system ) सबसे पहले जानते हैं की अपवाह किसे कहते हैं तो जवाब है निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को अपवाह कहते हैं और इन्हीं वाहिकाओं के जाल को अपवाह तंत्र कहते हैं। और इनका एक अपना स्वरुप होता है जिसमे मैं कुछ मुख्य अपवाह प्रतिरूप का उल्लेख्य करने जा रहा हूँ।  (1) जो अपवाह प्रतिरूप पेंड़ की शाखाओं के सामान हो उसे वृक्षाकार प्रतिरूप कहा जाता है।  (2) जब नदियाँ पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में बहती हैं उसे अरीय प्रतिरूप कहते हैं।  (3) जब मुख्य  नदियां एक दुसरे के सामानांतर बहती बहती हों और सहायक नदियां समकोण पे मिले तो ऐसे प्रतिरूप को जालीनुमा कहते हैं।  (4) जब सभी दिशाओं से नदियाँ बहकर किसी झील में विसर्जित होती हैं टी इसे अभिकेंद्रिय प्रतिरूप कहते हैं।  नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहते हैं। और एक अपवाह द्रोणी से दुसरे को अलग करने वाली सीमा को जल विभाजक कहते हैं। और छोटी नदियों एवं नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को जल सांभर कहते हैं।  भारतीय अपवाह तंत्र को विसर्जन के आधार पर दो भागों में बांटा जा सकता है अ…

भारतीय मरुस्थल एवं द्वीप समूह/Indian Deserts And Islands-Indian Geography

भारतीय मरुस्थल एवं द्वीप समूह - भारतीय मरुस्थल - आज हम बात  हैं भारत के विशाल मरुस्थल के बारे में जोकि अरावली पहाड़ी के उत्तर पूर्व में स्थित है जोकि  ऊबड़ खाबड़ भूखंड हैं जिस पर बहुत से रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं और यहां पर वार्षिक वर्षा 150 मिलीमीटर से काम होती है जसकी वजह से यह क्षेत्र शुष्क एवं बनस्पति से विहीन है जिसके इसे मरुस्थल कहा जाता है। लेकिन यह माना जाता है की मोसोजोइक काल में यह समुद्र का हिस्सा था जिसकी पुस्टि जीवाश्म निक्षेपों के पाए। यहां की प्रमुख स्थलकृतियाँ रेतीले टीले,छत्रक, चट्टान हैं ढाल के आधार पर मरुस्थल को दो  भागों में बांटा जा सकता है सिंध की ओर ढाल वाला उत्तरी भाग एवं कच्छ की ओर ढाल वाला दक्षिणी भाग और यहां की महत्वपूर्ण नदी लूनी है।  तटीय मैदान- भारत की तट रेखा बहुत लम्बी है जिसे दो भागों में बांटा जा सकता है -पश्चिमी तटीय मैदान एवं पूर्वी तटीय मैदान जिसमे पश्चिमी तटीय मैदान जलमग्न तटीय मैदानों का अच्छा उदाहरण है जलमग्न होने की वजह से पश्चिमी तटीय मैदान एक संकीर्ण पट्टी मात्रा है जिसके कारण बंदरगाह विकाश के लिए प्राकृतिक परिस्थित प्रदान करता है यहां …

भारत की संरचना एवं भूआकार (उत्तर भारत का मैदान/Structure And Landscape Of India (Plane Of North India )

भारत की संरचना एवं भूआकार (उत्तर भारत का मैदान ) उत्तर भारत का मैदान सिंधु एवं गनगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के द्वारा बहाकर लाये गए जलोढ़ से बना है और उत्तर भारत के इस मैदान की पूर्व से पश्चिम लम्बाई 3200 किलोमीटर है और चौड़ाई 150 से 300 किलोमीटर है और इस जलोढ़ की गहराई 1000 से 2000 मीटर है और उतर से दक्षिण इस मैदान को तीन भाग में बाँट सकते हैं भाभर ,तराई,और जलोढ़ मैदान और जलोढ़ मैदान को दो भागों में बाँट सकते हैं पुराना जलोढ़ बांगर कहलाता है और नया जलोढ़ मैदान खादर कहलाता है।  भाभर - यह 8 से 10 किलोमीटर चौड़ी पट्टी है जो शिवालिक के सामानांतर फैली हुई है हिमालय से निकलती हुई नदियां यहां पर अपने साथ लाये हुए कंकड़ पत्थर एवं शैल को जमा कर देती हैं और स्वयं इन कंकड़ पत्थर में लुप्त हो जाती हैं और भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र हैं जहां भाभर में लुप्त नदियां  फिर से धरातल पर निकल आती हैं तराई की चौड़ाई 10 से 20 किलोमीटर है तराई क्षेत्र बनस्पति से घिरा हुआ विभिन्न प्राणियों का घर है और तराई  दक्षिण में मैदान है जोकि जलोढ़ निर्मित है।  उत्तर  बहने वाली नदियां अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं ज…

भारत की संरचना एवं भूआकृत -/Structure and Landscape of India- Indian Geography

भारत की संरचना एवं भूआकृत - वर्तमान अनुमान के अनुसार पृथवी की आयु लगभग 46 करोड़ वर्ष है और इतने लम्बे समय में भीतरी और बाहरी बलों से कई परिवर्तन हुए हैं इसमें करोड़ों वर्ष पहले इंडियन प्लेट भूमध्य रेखा से दक्षिण में स्थित थी और आकर में काफी बड़ी थी और ऑस्ट्रेलियन प्लेट इसी का हिस्सा थी लेकिन करोड़ों वर्षों के दौरान यह प्लेट काफी हिस्सों में  टूट गयी और ऑस्ट्रेलियन प्लेट दक्षिण पूर्व तथा इंडियन प्लेट उत्तर दिशा की ओर खिसकने लगी और इसका खिसकना अभी तक जारी है। भू संरचना एवं शैल समूहों के भिन्नता के आधार पर भारत को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।  प्रायद्वीपीय खंड - प्रायद्वीपीय खंड  की उत्तरी सीमा कटी फटी है जो कच्छ से सुरु होकर अरावली पहाड़ी के पश्चिम से गुजरती हुई दिल्ली तक  एवं गंगा नदी के सामानांतर राजमहल की पहाड़ियों एवं गंगा डेल्टा तक जाती है इसके आलावा उत्तर पूर्व में कार्बी ऐंगलोंग एवं मेघालय के पठार एवं पश्चिम में राजस्थान तक इसका विस्तार है। पश्चिम बंगाल में स्थित  मालदा भ्रंस मझले एवं कार्बी ऐंगलोंग पठार को नागपुर पत्थर से अलग करता है। और यह पठारीय क्षेत्र ग्रेनाईट से बना है।  …