सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि भारतीय संविधान की -Indian Polity

भारत में अंग्रेजों का आगमन १६०० में ब्यापार करने के उद्देश से हुआ था पर भारत की राजनितिक परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं जिसने अंग्रेजो को प्रोत्साहित किया भारत की राजनीत में हस्ताछेप करने के लिए। क्यूंकि उस समय तक सक्तिसाली मुग़ल  साम्राज्य का बिघटन हो चूका था और छेत्रिय शक्तियां आपस में ही लड़ रही थीं और उनमे से कोई इतना सक्तिसाली नहीं था की भारत की बागडोर संभाल सके मराठा इस कमी को पूरा कर सकते थे पर उनमें भी आपसी एकता की कमी थी जिसका फायदा अंग्रेजों को हुआ और उन्होंने इसका फायदा उठाते हुए भारत की राजनीत में हस्तछेप किया और अपने लाभ को आधीक से अधिक सुनिश्चित किया। और अपने भारत पे शासन के दौरान जो नियम अपनाया या लागु किया यहीं से भारतीय संविधान की शुरुआत हुई जिसका उल्लेख्य मैं करने जा रहा हूँ।

१७७३ का रेगुलेटिंग एक्ट 

अंग्रेजों द्वारा लाये गए अधिनियम में इसका अत्यधिक महत्व है इसके तहत कौनसे महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए उसका उल्लेख्य करूँगा। 
इसके तहत पहली बार कंपनी के राजनितिक और प्रशासनिक कार्यों को मान्यता मिली और भारत में केंद्रीय शासन की नीव रखी गयी। इस अधिनिया की प्रमुख विषेशताएं निम्न्लिखित हैं। 
(१ ) इस कानून के द्वारा बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल का पदनाम मिला और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यों की कार्यकारी परिषद् का गठन किया गया पहले गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंग्स थे 
(२ )मद्रास और बम्बई के गवर्नर को बंगाल के गवर्नर जनरल के आधीन कर दिया गया जो की पहले अलग अलग थे 
(३ )१७७४ में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायलय की स्थापना की गयी जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य थे पहले मुख्य न्यायाधीश सर एलिजाह इम्पे थे और कंपनी के कर्मचारियों को निजी ब्यापार करने से प्रतिबंधित कर दिया गया 
(४ )कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण ससक्त हो गया और राजस्व नागरिक और सैन्य मामलों की जानकारी देना ब्रिटिश सर्कार को अनिवार्य कर दिया गया। 
१७८४ का पिट्स इंडिया एक्ट रेगुलेटिंग एक्ट की कमी को दूर करने के लिए इसे लाया गया था इसकी कुछ प्रमुख विशेस्ताएं इस प्रकार हैं 
(१ )कंपनी के राजनितिक और बाणिज्यिक कार्यों को अलग कर दिया गया,निदेशक मंडल को ब्यापारिक मामलों के अधीछन की अनुमति दी गयी लेकिन राजनितिक मामलों के लिए नियंत्रण बोर्ड नाम से एक निकाय का गठन किया गया। इस प्रकार द्वैध शासन की शुरुआत हुयी। 
(२)नियंत्रण बोर्ड को यह शक्ति थी की वह ब्रिटिश नियंत्रित भारत में सभी नागरिक और सैन्य सरकार व राजस्व गतिविधियों पर नियंत्रण करे। 
१८३३ का चार्टर अधिनियम ब्रिटिश भारत के केन्द्रीयकरण में इस अधिनियम की महत्वपूर्ण भूमिका थी जो की इस तरह हैं 
(१ )बंगाल के गवर्नर जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया  जिसमें सभी नागरिक और राजनितिक शक्तियां निहित थी लार्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथा गवर्नर जनरल थे ,मद्रास और बम्बई के गवर्नर से बिधायिका सम्बन्धी शक्ति छीन ली गयी और इसके अंतर्गत बने कानून को नियामक कानून कहा गया और नए कानून के तहत बने कानून को अधिनियम कहा गया। 
(२ )कंपनी के ब्यापारिक गतिविधियों को समाप्त कर पूर्ण रूप से प्रशासनिक निकाय बना दिया गया ,सिविल सेवकों के चयन हेतु खुली प्रतियोगता करने का प्रयास किया गया। 
१८५३ का चार्टर अधिनियम संवैधानिक विकाश की दृस्टि से यह अधिनियम महत्वपूर्ण है इसकी प्रमुख विसेस्ताएं इस प्रकार हैं। 
(१ )गवर्नर जनरल की परिषद् के बिधायी और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया जिसके तहत पार्षद में छ नए पार्षद जोड़कर इन्हे बिधानपार्षद नाम दिया गया,सिविल सेवकों के चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का आरम्भ हुआ जोकि भारतियों के लिए खोल दी गयी जिसके लिए १८५४ में मैकाले सिमित का गठन किया गया 
(२ )इसने प्रथम बार भारतीय केंद्रीय बिधान परिषद् में स्थानीय प्रतिनिधित्व का सुभारम्भ किया।
१८५८ का भारत शासन अधिनियम इसका निर्माण १८५७ के बिद्रोह के बाद हुआ इसको भारत का शासन अच्छा बनाने वाला अधिनियम कहा जाता है जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को समाप्त कर सारी शक्तियां ब्रिटिश राजशाही को हस्तांतरित कर दी। इसकी कुछ प्रमुख विशेस्ताएं इस प्रकार हैं।
(१ )भारत का शासन सीधे महारानी विक्टोरिया के हाँथ चला गया ,गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर वॉयसरॉय कर दिया गया और ऐसे प्रथम वॉयसरॉय लार्ड कैनिंग बने। 
(२ )इसने भारत में द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त कर दिया,नए पद भारत के राज्य सचिव का सृजन किया गया जिसमे भारतीय शासन की शक्ति निहित थी जिसकी सहायता के लिए १५ सदस्यों की एक सिमित का गठन किया गया जिसका अध्यछ सचिव को बनाया गया।
१८६१ का अधिनियम कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीयन को शामिल करने की शुरुआत हुई,जिसके तहत १८६२ में लार्ड कैनिंग ने तीन भारतियों बनारस के राजा ,पटियाला के महाराजा,और सर दिनकर राव को बिधान परिषद् में मनोनीत किया।
१९०९ का अधिनियम (मार्ले मिंटो सुधर )इस अधिनियम की प्रमुख विषेशताएं
(१)केंद्रीय और प्रांतीय विधानपरिषदों के आकर में बृद्धि जिसकी संख्या केंद्रीय परिषद् में १६ से ६० कर दी गयी ,केंद्रीय परिषद् में सरकारी बहुमत को बनाये रखा गया लेकिन प्रांतीय में गैर सरकारी सदस्यों को बहुमत की अनुमति थी।
(२ )परिषद् के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया गया और पहली बार किसी भारतीय को  वॉयसरॉय और गवर्नर की परिषद् के साथ एसोसिएशन बनाने की अनुमति दी गयी वॉयसरॉय की कार्यपालिका परिषद् के प्रथम भारतीय सदस्य सतेन्द्र प्रसाद सिन्हा को बनाया गया
(३ )पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया जिसके तहत मुस्लिम मतदाता ही मुस्लिम सदस्यों का चुनाव कर सकते थे इस तरह इस अधिनियम ने साम्प्रदाइकता को वैधानिकता प्रदान की और लार्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में ख्याति मिली।
१९१९ का अधिनियम (मॉन्टेग चेम्सफोर्डे सुधर )इस अधिनियम को १९१९ में बनाया गया और १९२१ में लागू हुआ जिसकी कुछ प्रमुख विशेस्ताएं इस प्रकार हैं
(१ )केंद्रीय और प्रांतीय विषयों की सूची की पहचान कर उन्हें अलग किया गया और राज्यों पर केन्द्री नियंत्रण काम किया गया,और अपनी सूचियों के विषयों पर विधान बनाने का अधिकार मिला।
(२ )पहली बार द्विसदनीय ब्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की ब्यवस्था प्रारम्भ हुई इस प्रकार राजयसभा और लोकसभा का गठन किया गया जिनके सदस्यों का निर्वाचन प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से होता था।
(३ )वॉयसरॉय की कार्यकारी परिषद् के ६ सदस्यों में से तीन भारतीय होना अनिवार्य था,साम्प्रदयिक आधार पर सिक्खों ,भारतीय इशाईयोँ और आँग्ल भारतियों के लिए पृथक निर्वाचन का विस्तार ,१९२६ में लोकसेवा आयोग का गठन किया  गया।
भारत शासन अधिनियम १९३५ भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में महत्वपूर्ण अधिनियम था जिसमें ३२१ धाराएं और १० अनसूचियाँ थीं इसकी कुछ प्रमुख विशेस्ताएं इस प्रकार हैं
(१ )अखिल भारतीय संघ की स्थापना  जिसके तहत तीन सूचियों के आधार पर शक्तियों का बंटवारा संघीय सूची में ५९ विषय राज्यसूचि में ५४ विषय और सँवरतिसूचि में ३६ विषय थे ,प्रांतों में द्वैधशासन समाप्त कर प्रांतीय स्वायत्ता का आरम्भ किया गया ,केंद्र में द्वैधशाषन प्रणाली का आरम्भ किया गया ,दलित जातियों और महिलाओं और मजदूर वर्ग के लिए अलग से निर्वाचन की ब्यवस्था कर सांप्रदायिक निर्वाचन का विस्तार किया गया। मुद्रा और शाख पर नियंत्रण हेतु रिज़र्व बैंक की स्थापना की गयी,और १९३७ में संघीय न्यायालय की स्थापना की गयी।

नोट इस तरह हम कहा सकते हैं की भारतीय संविधान के निर्माण में ब्रिटिश द्वारा लाये गए अधिनियमों का महत्वपूर्ण योगदान था इसके साथ अन्य देशों के संविधान से भी हमने कुछ न कुछ ग्रहण किया है जो हमारे लिए महत्वपूर्ण था। 





टिप्पणियां

टिप्पणी पोस्ट करें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अनसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग /National Commission For Scs & STs - Indian Polity

अनसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग - राष्ट्रीय अनसूचित आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत किया गया है इसमें एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य होते हैं यानी की ये एक बहुसदस्यीय निकाय है जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उसके आदेश एवं मोहर लगे पात्र द्वारा की जाती है और इनकी सेवा शर्तें एवं कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किये जाते हैं।  आयोग के कार्य - (1) अनसूचित जातियों के संवैधानिक संरक्षण से सम्बंधित सभी मामलों का निरीक्षण एवं अधीक्षण करना ,अनसूचित जातियों के हितों का उल्लंघन करने वाले किसी मामले की जांच पड़ताल एवं सुनवाई करना।  (2) अनसूचित जातियों के सामाजिक विकाश से सम्बंधित योजनाओं के निर्माड के समय सहभागिता करना एवं परामर्श देना और उनके विकाश से सम्बंधित कार्यों का मूल्यांकन करना।  (3) संरक्षण के सम्बन्ध में उठाये गए क़दमों के बारे में राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करना ,इनके संरक्षण हेतु केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की समीक्षा करना और उचित सिफारिस करना।  (4) राष्ट्रपति के आदेश पर अनसूचित ज

संघ लोकसेवा आयोग /Union Public Service Commission- Indian Polity

संघ लोकसेवा आयोग - संघ लोकसेवा आयोग भारत का केंद्रीय भर्ती संस्था है जोकि एक स्वतंत्र एवं संवैधानिक संस्था है जिसका उल्लेख्य संविधान के भाग 14 के अनुच्छेद 315 से 323 तक इसके शक्ति एवं कार्य और इसके सदस्यों की नियुक्ति आदि का उल्लेख्य किया गया है।  आयोग की संरचना- संघ लोकसेवा आयोगमे एक अध्यक्ष एवं कुछ अन्य सदस्य होते हैं पर इनकी संख्या अध्यक्ष सहित 10 से 11 तक हो सकती है जोकि भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होते हैं पर आयोग के सदस्यों की योग्यता का कोई उल्लेख्य नहीं किया गया है लेकिन आयोग के आधे सदस्यों को भारत या राज्य सरकार के आधीन 10 वर्ष तक काम करने का अनुभव हो।  इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 की उम्र तक होता है जो भी पहले पूरा हो पर वे कभी भी रस्ट्रपति को अपना  त्यागपत्र सौंप सकते हैं या उन्हें कार्यकाल से पहले राष्ट्रपति के द्वारा हटाया जा सकता है।  निष्कासन - राष्ट्रपति संघ लोकसेवा आयोग के सदस्यों को इन परिस्थितियों में हटा सकता है -; उसे दीवालिया घोषित कर दिया जाता है ,अपने पद के दौरान किसी और लाभ के पद में लगा हो ,यदि राष्ट्रपति समझता है की वह मानशिक या अछमता क

वित्त आयोग /Finance Commission- Indian Polity

वित्त आयोग - संविधान में अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्ध न्यायिक संस्था के रूप में वित्त आयोग की ब्यवस्था की गयी है जिसका गठन राष्ट्रपति के द्वारा हर पांचवे वर्ष किया जाता है। जिसमे एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं यानि की वित्त आयोग बहु सदस्यीय संस्था है जिनकी नियुक्त राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है और इनके कार्यकाल का निर्धारण राष्ट्रपति ही करता है और इनकी पुनर्नियुक्ति भी हो सकती है।  योग्यता - संविधान ने संसद को इन सदस्यों की योग्यता का निर्धारण का अधिकार दिया है जिसके तहत संसद ने आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की विशेष विशेष योग्यताओं का निर्धारण किया गया है  अध्यक्ष सार्वजनिक मामलों का अनुभवी होना चाहिए , एक सदस्य उच्च न्यायालय का न्यायधीश या इस पद के योग्य ब्यक्ति।  दूसरा सदस्य जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो।  तीसरा सदस्य जिसे प्रशासन एवं वित्तीय मामलों का अनुभव हो।  चौथा सदस्य अर्थसास्त्र का विशेष ज्ञाता हो।  कार्य - वित्त आयोग राष्ट्रपति को इन मामलों में सिफारिस करता है -; (1) संघ और राज्यों के बीच करों के सुद्ध आगमों का वितरण औ