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संविधान की प्रमुख विशेस्ताएं/Salient Features Of The Constitution-Indian Polity

भारतीय संविधान तत्वों और मूल भावना के मामले में अद्भुत है क्यूंकि इसका निर्माण दुनिया के कई देशों से अनुभव लेकर हुआ था और उनसे जरूरी चीजों को ग्रहण किया गया
विषेशताएं -सबसे लम्बा लिखित संविधान क्यूंकि संविधान को दो भागों में बांटा जाता है  लिखित  और अलिखित जिसके उदाहरण हैं अमेरिका और ब्रिटेन। इस वक़्त हमारे संविधान में 465 अनुच्छेद और 12 अनसूचियाँ हैं 
बिभिन्न श्रोतों से विहित -भारतीय संविधान के अधिकतर उपबंध बिश्व के कई देशों और 1935 के अधिनियम से लिया गया है जिसमे मुख्यरूप से अमेरिका ब्रिटेन ,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जापान रूस फ्रांस आदि से लिया गया है। 
नम्यता और अनम्यता का संयोग -संविधान को नम्यता और अनम्यता की दृस्टि से भी अलग किया जाता है नम्य संविधान वह कहलाता है जिसमें संसोधन की प्रक्रिया किसी आम कानून की तरह हो जिसका उदाहरण ब्रिटेन का संविधान है और अनम्य संविधान उसे माना जाता है जिसमे संसोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया हो जिसका उदाहरण अमेरिकी संविधान है। पर इस मामले में भारत का संविधान मिश्रित है ना तो ज्यादा लचीला है ना अत्यधिक कठोर जिसे अनुछेद 368 के तहत दो भागों में बिभक्त किया गया है कुछ उपबंधों को सांसद के विशेष बहुमत से संसोधित किया जा सकता है और कुछ को आम संसोधन प्रक्रिया द्वारा। 
एकात्मकता की ओर झुकाव -भारतीय संविधान संघीय सर्कार की स्थापना करता है जिसमे संघ के सभी लच्छन मौजूद हैं जैसे-दो सरकार,शक्तियों का बिभाजन,लिखित संविधान,संविधान की सर्वोचता,संविधान की कठोरता,पर इसमें एकात्मकता के लच्छन भी मौजूद हैं जैसे-ससक्त केंद्र,एक संविधान,एकल नागरिकता,लचीलापन,एकीकृत न्यायपालिका आदि।
सरकार का संसदीय रूप - भारतीय संविधान ने ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है जोकी बिधायिका और कार्यपालिका के समन्वय पर आधारित है,भारत में संसदीय प्रणाली की कुछ प्रमुख विषेशताएं इस प्रकार हैं
_वास्तविक और नाममात्र की कार्यपालिका का होना,बहुमत वाले दाल की सत्ता,बिधायिका में मंत्रियों की सदस्य्ता,प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व,निचले सदन का बिघटन।
एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका -हमारे संविधान ने एक ऐसे न्यायपालिका की ब्यवस्था की है जो की एकीकृत और स्वतंत्र है जिसमे शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय है फिर राज्यों में उच्च न्यायालय है और उसके बाद क्रमसः अधीनस्थ न्यायालय और जिला अदालतें हैं।
मौलिक अधिकार -संविधान के भाग तीन में 6 मौलिक अधिकारों का उल्लेख्य है जो इस प्रकार हैं
समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18 तक)
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22 तक )
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24 तक)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28 तक )
सांस्कृतिक और शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30 तक )
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32 )
मौलिक अधिकार का उद्देश्य राजनितिक भावना को प्रोत्साहन देना है जिसका हनन होने पर न्यायालय जाया जा सकता है और न्यायालय के माध्यम से इसे लागू करवाया जा सकता है।
नीत निर्देशक तत्व -यह भारतीय संविधान की अनूठी विशेसता है जिसका उल्लेख्य संविधान के चौथे भाग के अनुच्छेद 36 से 51 तक किया गया है,जोकि तीन भागों में बिभाजित है सामाजिक,गाँधीवादी उदार,बौद्धिक जिसका कार्य सामाजिक और आर्थिक  लोकतंत्र को बढ़ावा देना है जिनका उद्देश्य भारत में कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है प् इनको कानूनी रूप से लागू नहीं करवाया जा सकता।
मूल कर्तव्य -स्वर्ण सिंह सिमित के सिफारिस के आधार पर 1976 में 42वें संसोधन के तहत इन्हें शामिल किया गया था जिसमे 10 मूल कर्तव्य थे पर 2002 में 86वें संसोधन के तहत एक और कर्तव्य को जोड़ा गया जिससे मूल कर्तव्यों की संख्या ११ हो गयी जिसका उल्लेख्य संविधान के भाग पांच के अनुच्छेद 51 में है।


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