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उप राष्ट्रपति /Vice -President -Indian Polity

उप राष्ट्रपति -देश का दूसरा सर्वोच्च पद होता है जोकि अमेरिका से लिया गया है।  निर्वाचन -राष्ट्रपति की तरह उप राष्ट्रपति को भी जनता द्वारा सीधे नहीं चुना जाता बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से दोनों सदनों के निर्वाचक मंडल द्वारा चुना जाता है पर यह राष्ट्रपति के निर्वाचन से अलग है -; इसमें संसद के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य शामिल होते हैं ,राज्य विधानसभाओं के सदस्य इसमें शामिल नहीं होते हैं बाकी उप राष्ट्रपति का भी चुनव अनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय पद्धति द्वारा होता है।  योग्यता -भारत का नागरिक हो,35 की आयु पूरी कर चूका हो ,राजयसभा सदस्य बनने के योग्य हो ,केंद्र,राज्य,एवं स्थानीय संसथान में लाभ के पद पर ना हो नामांकन के लिए उम्मीदवार को कम से कम 20 प्रस्तावक और 20 अनुमोदक होने चाहिए और उम्मीदवार केन्द्री बैंक में 15000 रूपए जमानत क रूप में जमा कराएगा।   पद की शर्तें एवं कार्यकाल -संसद के किसी भी सदन का सदस्य न हो एवं राज्य विधायिका के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होना चाहिए और लाभ के पद पर ना हो।  उप राष्ट्रपति का कार्यकाल पदग्रहण से लेकर पांच वर्ष तक का होता है पर वह अपने कार्यकाल के…

राष्ट्रपति पर महाभियोग / Impeachment On President-Indian Polity

राष्ट्रपति पर महाभियोग -राष्ट्रपति पर संविधान का उल्लंघन करने पर महाभियोग चलकर उसे पद से हटाया जा सकता है महाभियोग का आरोप संसद के किसी भी सदन लाया जा सकता है इस आरोप पर उस सदन के एक चौथाई सदस्यों का हस्ताक्षर होना चाहिए और राष्ट्रपति को 14 दिन का नोटिस देना चाहिए। महाभियोग का प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित होकर दुसरे सदन में जाता है जिसे इन आरोपों की जांच करनी चाहिए यदि दूसरा सदन आरोपों को सही पाता है और महाभियोग प्रस्ताव को दो तिहाई बहुमत से पारित कर देता है तो राष्ट्रपति को प्रस्ताव पारित तिथि से हटना होगा।  संसद के दोनों सदनों के नामांकित सदस्य जिन्होंने चुनाव में भाग नहीं लिया था वो इस महाभियोग में भाग ले सकते हैं लेकिन राज्य विधानसभओं के सदस्य निर्वाचित या मनोनीत इसमें भाग नहीं ले सकते हैं।  राष्ट्रपति के पद की रिक्तता -पांच वर्ष  का कार्यकाल समाप्त होने पर ,त्यागपत्र देने पर,उसकी मृत्यु पर,या फिर पद ग्रहण के काबिल ना हो।  अगर पद रिक्त का कारण उसके कार्यकाल का समाप्त होना है तो उस पद को भरने के लिए कार्यकाल पूरा होने से पहले चुनाव करना चाहिए अगर चुनाव मेदेरी हो तो राष्ट्रपति अप…

राष्ट्रपति /President -Indian Polity

राष्ट्रपति -संविधान के भाग 5 के अनुच्छेद 52 से 78 तक संघ की कार्यपालिका का वर्णन है जिसके तहत राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,मंत्रिमंडल,एवं महान्यायवादी शामिल होते हैं राष्ट्रपति राज्य प्रमुख होता है भसरत का प्रथम नागरिक और राष्ट्र की एकता अखंडता का प्रतीक होता है।  निर्वाचन -राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है जिसमे शामिल होते हैं -;संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य ,राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य ,एवं दिल्ली और पुडुचेरी विधानसभा के निर्वाचित सदस्य आदि।  कौन शामिल नहीं होता -संसद के दोनों सदनों के मनोनीत सदस्य ,विधानसभा के मनोनीत सदस्य ,विधानपरिषदों के सदस्य ,और जब कोई सभा विघटित हो गई हो तो उसके सदस्य शामिल नहीं होते हैं।  राष्ट्रपति का चिनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के द्वारा एकल संक्रमणीय पद्धति द्वारा संपन्न होता है और किसी विवाद के उत्पन्न होने पर इसका फिसला करने का अधिकार उच्चत्तम न्यायालय को सिर्फ है।  योग्यता -वह भारत का नागरिक हो,35 वर्ष की आयु पूरी कर चूका हो,लोकसभा सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो,और वह किसी संघ,राज्य,स्थानीय संसथान में लाभ के पद पर न…

आपातकाल का मूल अधिकारों पर प्रभाव /Emergency Effect On Fundamental Rights -Indian Polity

आपातकाल का मूल अधिकारों पर प्रभाव -अनुच्छेद 358 और 359 राष्ट्रीय आपातकाल में मूल अधिकारों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जिसमे अनुच्छेद 358 अनुच्छेद 19 के तहत आने वाले मूलाधिकारों के निलंबन से सम्बन्धित है जबकि अनुच्छेद 359 अन्य मूल अधिकारों के निलंबन से सम्बंधित है लेकिन अनुच्छेद 20 एवं 21 के तहत आने वाले अधिकार निलंबित नहीं होते आपातकाल में।  अनुच्छेद 19 के तहत आने वाले अधिकारों का निलंबन - अनुच्छेद 358 के अनुसार जब राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की जाती है तब अनुच्छेद 19 द्वारा मिले मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते है इनके लिए किसी अलग आदेश की जरूरत नहीं पड़ती आपातकाल लागू होने पर राज्य अनुच्छेद 19 के तहत आने वाले अधिकारों को कम कर सकता है और हटाने के लिए कानून बना सकता है और आपातकाल समाप्त होने पर अनुच्छेद १९ के तहत आने वाले अधिकार स्वतः सक्रीय हो जाते हैं लेकिन अनुच्छेद 19 के तहत आने वाले छह अधिकारों का निलंबन युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर ही होता है ना की ससस्त्र विद्रोह के आधार पर।  अन्य मूल अधिकारों का निलंबन -अनुच्छेद 359 राष्ट्रपति को मूल अधिकारों को लागू करने के लिए न्यायालय मे…

आपातकालीन प्रावधान /Emergency provisions -Indian Polity

आपातकालीन प्रावधान -संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधान उल्लिखित है ये प्रावधान केंद्र को किसी भी आसामान्य स्थिति से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम बनाते हैं जिसका संविधान में जोड़ने का उद्देश्य देश की स्वतंत्रता,सम्प्रभुता एवं एकता ,अखंडता को सुरक्षित करना है। आपातकाल के समय केंद्र सरकार के पास साड़ी शक्ती आ जाती है और सारे राज्य केंद्र के नियंत्रण में आ जाते हैं इस तरह भारत का संविधान परस्थितियों के हिसाब से एकात्मक एवं संघीय हो सकता है। आमतौर पर यह संघीय ब्यवस्थाके रूप में कार्य करता है पर आपातकाल में एकात्मक हो जाता है।  संविधान में तीन तरह के आपातकाल का उल्लेख्य है जैसे-; (1 )युद्ध बाहरी आक्रमण और ससस्त्र विद्रोह के कारण लगाए गए आपातकाल को रस्त्र्य आपातकाल के नाम से जाना जाता है जोकि अनुच्छेद 352 के तहत लगाया जाता है।  (2 )संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर लगाए गए आपातकाल को राष्ट्रपति शासन के नाम से जाना जाता है जोकि अनुच्छेद 356 के तहत लागू होता है।  (3 )बित्तीय स्थाईत्व एवं शाख के खतरे के आधार पर लगाए गएआपात्काल को वित्तीय आपातकाल कहा जाता है जोकि…

अन्तर्राजीय सम्बन्ध /Inter -State Relations (Indian Polity )एम.लक्ष्मीकांत

अंतर्राज्यीय सबंध -भारतीय संघीय ब्यवस्था की सहायता मात्र केंद्र तथा राज्यों के सौहार्दपूर्ण के अन्तर्सम्बन्धों पर भी निर्भर करती है। संविधान ने अंतर्राजीय सौहार्द के सम्बन्ध में   प्रावधान हैं।
अंतर्राज्यीय जल विवाद -संविधान के अनुच्छेद 262 अंतर्राज्यीय जल विवादों से सम्बंधित है जिसमे दो प्रावधान हैं -;संसद कानून बनाकर अंतर्राजीय नदियों तथा नदी घाटियों के प्रयोग बंटवारे तथा नियंत्रण से सम्बंधित किसी विवाद पर शिकायत का निपटारा कर शक्ति है ,संसद यह भी ब्यवस्था कर सकती है की ऐसे किसी विवाद में ना ही उच्चतम न्यायालय और ना ही कोई अन्य न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करे।
अंतर्राजीय जल विवाद अधिनियम केंद्र सरकार को नदी अथवा नदी घाटी के जल के सम्बन्ध में दो अथवा अधिक राज्यों के मध्य विवाद के निपटारे हेतु एक अस्थाई न्यायालय की गठन की शक्ति प्रदान करता है जिसका निर्णय अंतिम एवं विवाद से सम्बंधित सभी पछों के लिए मान्य होता है। यदि जल विवादों से विधिक या हित जुड़े हुए तो उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार है की वह राज्यों के मध्य विवादों की स्थिती में उनसे जुड़े मामले की सुनवाई कर सकता है लेकिन इस…

केंद्र -राज्य सबंध /Centre State Relationship (Indian Polity )

केंद्र राज्य सबंध -भारत का संविधान अपने स्वरुप में संघीय है और सारी शक्तियां केंद्र और राज्य में बिभाजित है। संविधान में एकल न्यायिक ब्यवस्था की गयी है जो केंद्रीय कानूनों की तरह राज्य कानून को लागू करती है वैसे केंद्र और राज्य अपने अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हैं। पर सघीय तंत्र के क्रियान्वन के लिए आपसी सामंजस्य जरूरी है।
विधाई सम्बन्ध -संविधान के भाग 11 में अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र राज्य विधाई संबंधों की चर्चा की गई है किसी अन्य संघीय संविधान की तरह भारतीय संविधान भी केंद्र एवं राज्यों के बीच उनके क्षेत्र के हिसाब से विधाई शक्तियों का बंटवारा करता है इसके अतिरिक्त संविधान पांच असाधारण परिस्थीतियों के अंतर्गत राज्य क्षेत्र में संसदीय विधान सहित कुछ मामलों में राज्य विधान मंडल पर केंद्र के नियंत्रण की ब्यवस्था करता है। संसद पूरे भारत या इसके किसी भी क्षेत्र के लिए कानून बना सकती है और राज्य विधानमंडल पूरे राज्य या उसके किसी क्षेत्र के लिए कानून बना सकता है पर उसके द्वारा बनाये गए कानून को राज्य के बाहर लागू नहीं कराया जा सकता है ,केवल संसद अकेले अतिरिक्त क्षेत्रीय कानून बना सकती है …

संघीय ब्यवस्था /Federal System -(Indian Polity )एम.लक्ष्मीकांत

 संघीय ब्यवस्था -सरकार दो भागों में बिभक्त होती है एकल एवं संघीय यहां हम बात करेंगे संघीय ब्यवस्था की जिसे हमने अपनाया है ,संघीय सरकार उसे कहते हैं जिसमे शक्तियां केंद्र सरकार एवं क्षेत्रीय सरकार में बिभाजित होती हैं और दोनों अपने अपने अधिकार क्षेत्र में शक्तियों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र रहती हैं। भारत  संविधान में संघीय सरकार को अपनाया गया जिसे अपनाने के पीछे दो कारण बताये गए हैं देश का बड़ा आकार ,देश में सामाजिक सांस्कृतिक विविधता संविधान निर्माताओं ने महसूस किया की संघीय ब्यवस्था से न केवल सरकार की शक्ति बढ़ेगी। भारत की संघ्य ब्यवस्था कनाडा के मॉडल पर आधारित है जिसकी कुछ प्रमुख विषेशताएं इस प्रकार हैं।  द्वैध राजपद्धति -संविधान में संघ स्टार पर केंद्र और राज्य स्टार पर राजपद्धति को अपनाया गया है प्रत्येक को संविधान द्वारा अपने क्षेत्रों में शक्तियां दी गयी हैं जैसे केंद्र सरकार को राष्ट्रीय महत्त्व के मामले रक्षा,विदेश,मुद्रा,संचार आदि की शक्ति दी गयी है और राज्य सरकार स्थानीय मुद्दों को देखती है जैसे कृषि ,स्वास्थ्य,एवं स्थानीय मुद्दे आदि।  लिखित संविधान -हमारा संविधान न केवल लि…

संसदीय ब्यवस्था /Parliyamentary System (Indian Polity )एम. लक्ष्मीकांत

संसदीय ब्यवस्था -भारतीय संविधान केंद्र और राज्य दोनों में सरकार के संसदीय स्वरुप की ब्यवस्था करता है जिसका उपबंध अनुच्छेद 74 और 75 किया गया है ,और राज्यों के लिए अनुच्छेद 163 और 164 में ब्यवस्था की गयी है लोकतान्त्रिक सरकारें सरकार के कार्यपालिका और विधायिका अंगों के मध्य सबंधों के आधार पर संसदीय और राष्ट्रपति में वर्गीकृत होती है संसदीय ब्यवस्था उसे कहते हैं जिसमे जिसमे कार्यपालिका अपनी नीतियों और कार्यों के लिए बिधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। और राष्ट्रपति ब्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नीतियों और कार्यों के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदाई नहीं होती है ,संसदीय सरकार को कैबिनेट या उत्तरदायी सरकार  एवं सरकार का बस्तीमेंटर स्वरुप कहा जाता है।  संसदीय सरकार की विशेस्ताएं -संसदीय सरकार की विषेशताएं भारत में इस प्रकार हैं -; (1 )नामिक एवं वास्तविक कार्यपालिका -राष्ट्रपति नामिक है जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक दुसरे सब्द में हम कह सकते हैं की राष्ट्रपति राज्य  का नामिक मुखिया होता है जबकि प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया है प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद की ब्यवस्था अनुच्छेद 74 में की …

संविधान की मूल संरचना /Basis Structure Of The Constitution (Indian Polity ) एम. लक्ष्मीकांत

संविधान  की मूल संरचना- संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद मौलिक अधिकारों में संसोधन कर सकती है या नहीं यह मामला संविधान लागू होने के एक वर्ष बाद सर्वोच्च न्यायालय के सामने आ गया , जिसके तहत उच्चतम न्यायालय ने एक नया सिद्धांत दिया संविधान की मूल संरचना का जिसने ब्यवस्था दी की अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद के संवैधानिक अधिकार उसे संविदान की मूल संरचना को बदलने की शक्ति नहीं देते जिसका अर्थ यह है की संसद मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती और मूल अधिकारों को वापस नहीं ले सकती जो संविधान के मूल संरचना से जुड़े हों। संविधान ने संसद को सीमित संसोधनकारी शक्ति दी है इसलिए उस शक्ति का उपयोग करते हुए संसद इसे निरंकुशता तक नहीं बढ़ा सकती वास्तव में संसद की सीमित संसोधनकारी शक्ति संविधान की मूल विषेशताओं मे से एक है अतः इसको समाप्त नहीं किया जा सकता संसद अनुछेद 368 के अंतर्गत अपनी संसोधनकारी शक्ति को विस्तारित कर निरस्त करने का अधिकार हांसिल नहीं कर सकती।  मूल संरचना के तत्व - संविधान के मूल संरचना के अंतर्गत आने वाले उपबंध जो इस प्रकार है -; संविधान की सर्वोचता एवं संविधान का धर्म निरपेछ चरित…

संविधान का संसोधन /Amendment Of The Constitution (Indian Polity )-एम.लक्ष्मीकांत

संविधान का संसोधन-किसी अन्य लिखित संविधान की तरह भारतीय संविधान में भी परिस्थितयों और आवस्यकतानुसार संसोधित करने की ब्यवस्था है हालांकि संसोधन प्रक्रिया ना तो ब्रिटेन की तरह आसान है और ना ही अमेरिका की तरह अत्यधिक कठिन  इस तरह भारतीय संविधान दोनों का मिश्रण है ना तो आसान न बहुत कठिन।  संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 में संसोधन प्रक्रिया का उल्लेख्य किया गया है जिसमे  उल्लेखित है की संसद अपनी संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते हुए  संविधान में किसी उपबंध का परिवर्धन या परिवर्तन कर सकती है पर संसद उन ब्यवस्थाओं को संसोधित नहीं कर सकती जो संविधान के मूल ढाँचे से सम्बंधित हो इस ब्यवस्था को उच्चतम न्यायालय ने 1973 में दिया था।  संसोधन प्रक्रिया -अनुच्छेद 368 में संसोधन प्रक्रिया का उल्लेख्य किया गया है जो इस प्रकार है -; (1 )संसोधन की शुरुआत संसद के किसी सदन में इस प्रयोजन के लिए विधेयक पुनः स्थापित करके ही किया जा सकता है और राज्य विधानमंडल में नहीं।  (2 )विधेयक को किसी मंत्री या गैर सरकारी सदस्य द्वारा पुरः स्थापित किया जा सकता है और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्वस्वीकृति जरूरी नहीं है ,विधेयक …

मूल कर्तव्य /Fundamental Duties (Indian Polity) एम. लक्ष्मीकांत

मूल कर्तव्य - नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य आपस में सबंधित और अभिभाज्य है लेकिन मूल संविधान  मूल अधिकारों  को रखा गया ,न की  मूल कर्तव्यों को पर मूल कर्तव्यों को संविधान में 1976 में जोड़ा गया जिसे रूसी संविधान लिया गया 1976 में कांग्रेस पार्टी ने सरदार स्वर्ण सिंह सिमित का गठन किया,सिमित ने सिफारिस की कि संविधान में मूल कर्तव्यों का एक अलग पाठ होना चाहिए इस तरह 42वें संसोधन के तहत संविधान में एक नया भाग जोड़ा गया भाग 4 (क)जिसके तहत अनुच्छेद 51 क जोड़ा गया। जिसके  तहत नागरिकों के दस कर्तव्यों का उलेख्य किया गया है और 2002 में एक नए कर्तव्य को जोड़ा गया है।
मूल कर्तव्यों की सूची -(1 )संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों ,संस्थाओं ,राष्ट्रध्वज ,और राष्ट्रगान का आदर करें (2 )स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को ह्रदय में संजोय रखें और उनका पालन करें ,(3 )भारत की सम्प्रभुता ,एकता और अखंडता की रक्षा करें और उसे अछुण्ण रखे ,(4 )भारत के सभी लोगों में समरसता और सम्मान भातृत्व की भावना का निर्माण करें ,जो धर्म ,धर्म,भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेद भाव …

नीत निर्देशक तत्व (Indian Polity)-एम. लक्ष्मीकांत

नीति निर्देशक तत्व -इसका उल्लेख्य संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 36 से 51 तक है जिसे संविधान निर्माताओं द्वारा आयरलैंड के संविधान से लिया गया है जिसे आयरलैंड ने स्पेन के  था   संविधान के नीति निर्देशक तत्व संविधान की आत्मा हैं। ग्रेनविल ऑस्टिन द्वारा इसे संविधान की आत्मा कहा गया है इसकी कुछ प्रमुख विषेशताएं इस प्रकार हैं -;
(१ )निति निर्देशक तत्व से यह स्पस्ट होता है की नीतियों एवं कानूनों को प्रभावी बनाते समय राज्य इन तत्वों को ध्यान में रखेगा ये संवैधानिक निदेश या बिधायिका ,कार्यपालिका  प्रशासनिक मामलों में राज्य के लिए सिफारिशें हैं।
(२ )-आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य में आर्थिक ,सामाजिक  और राजनीती विषयों  निदेशक तत्व महत्वपूर्ण हैं जिनका उद्देश्य न्याय  उच्च आदर्श ,स्वतंत्रता,समानता,बनाये रखना है जैसा संविधान की प्रस्तावना में उल्लेख्य है जिसका उद्देश्य एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना है। आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना ही नीति निर्देशक तत्व का उद्देश्य है।
(3 )-निदेशक तत्व  गैर न्यायोचित हैं  मतलब इनके हनन होने पर इन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता ,अतः सरकार इन्हें …

रिट के प्रकार एवं क्षेत्र / (Indian Polity)

रिट के प्रकार एवं क्षेत्र- अनुच्छेंद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय एवं अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय रिट जारी कर सकते हैं ये हैं बंदी प्रत्यक्षीकरण ,परमादेश,प्रतिषेध,उत्प्रेषण,एवं अधिकार पृच्छा ,संसद किसी अन्य न्यायालय को भी रिट जारी करने का अधिकार दे सकती है पर अभी केवल उच्चतम  एवं उच्च न्यायालय ही इसे जारी कर सकते हैं। ये रिट अंग्रेजी कानून से लिए गए हैं जहां इन्हे विशेषाधिकार कहा जाता था जो की राजा द्वारा जारी किया जाता था जिन्हे अब भी न्याय का झरना उपनाम से जाना जाता है।
उचत्तम न्यायालय और उच्च न्यायालय के रिट जारी करने की शक्ति में कुछ भिन्नता है जो इस प्रकार है -;उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकार के क्रियान्वन को लेकर रिट जारी कर सकता है लेकिन उच्च न्यायालय किसी अन्य उद्देश्य को लेकर भी जारी कर सकता है,उच्चतम न्यायलय किसी एक ब्यक्ति या सरकार के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है जानकी उच्च न्यायलय सम्बंधित राज्य या ब्यक्ति के लिए ,उच्चतम न्यायालय अपने रिट को नकार नहीं सकता जबकि उच्च न्यायालय नकार सकता है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण -  इसे लैटिन भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है प्रस्तुत किया जाये…

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (Indian Polity)-

संस्कृत और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार - 
अनुच्छेद 29 से 30 तक इसका उल्लेख्य है - अनुच्छेद 29 -इसमें उल्लेख्य है की भारत के  भाग में  वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को जिसकी अपनी बोली भाषा ,लिपि ,संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार है। इसके आलावा किसी भी नागरिक को राज्य के अंतर्गत आने वाले संसथान या उससे सहायता प्राप्त संसथान में धर्म, जाति,भाषा ,के आधार पर प्रवेश से रोका नहीं जा सकता। यह अनुच्छेद धार्मिक अल्पसंख्यकों वाम भाषाई अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देता है वैसे उच्चतम न्यायालय ने ब्यवस्था दी है की इस अनुच्छेद की ब्यवस्था केवल अल्पसंख्यकों के मामले में नहीं है क्यूंकि नागरिकों सब्द का मतलब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों से है। उच्चतम न्यायालय ने यह भी ब्यवस्था दी है की भाषा की रक्षा में भाषा के संरक्षण हेतु आंदोलन करने का अधिकार भी सम्लित है।  अनुच्छेद 30 - इसके माध्यम से शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार शामिल है -;सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार है,राज्य आर्थिक सहायता में अल्पसंख्यकों द्वा…

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार-(Indian Polity)

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार-(अनुच्छेद 25 से 28 तक )
इसमें धर्म को मानने और आचरण करने का अधिकार दिया गया है जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
अनुच्छेद 25 -इसके अनुसार सभी ब्यक्तियों को आंतरिक स्वतंत्रता मिली है की वे अपने तरीके से किसी धर्म को मान सकते हैं उसके अनुसार आचरण कर सकते है और उसका प्रचार भी कर सकते हैं। जैसे कोई ब्यक्ति अपने तरीके से भगवन से सम्बन्ध बना सकता है उसे किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं है,अपने धार्मिक विश्वास एवं आस्था को सार्वजनिक तौर पर घोषणा करने का अधिकार,धार्मिक पूजा परंपरा समारोह करने और विचारों के प्रदर्शन की स्वातंत्रता ,अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है लेकिन किसी का जबरन धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार नहीं है। इससे यह स्पस्ट हो जाता है की अनुच्छेद 25 धार्मिक विस्वास के साथ आचरण को भी समाहित करता है।
अनुच्छेद 26 -  इसके अनुसार धार्मिक एवं मूर्ती पूजा के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार,धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध का अधिकार,जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन का अधिकार ,यह अनुच्छेद  धार्मिक संप्रदाय या इसके अनुभागों को अधिकार देता है। उच्चतम न्याय…

शोषण के विरुद्ध अधिकार -(Indian Polity

शोषण के विरुद्ध अधिकार -अनुच्छेद 23 से 24 तक इसका उल्लेख्य है जो इस प्रकार है -; अनुच्छेद 23 -यह अनुच्छेद मानव तस्करी ,बेगार,(बलात श्रम)आदि पर प्रतिबन्ध लगाता है। इसके अंतर्गत कोई उल्लंघन कानून के अनुसार दंडनीय होगा यह अधिकार नागरिक और गैर नागरिक दोनों के लिए उपलब्ध होगा ,मानव तस्करी के अंतर्गत आता है पुरुष ,महिला एवं बच्चों की बस्तु की तरह खरीद बिक्री,बेश्यावृत्ति ,देवदासी और किसी को दाश बना कर रखना शामिल है। ऐसे कृत्यों के करने पर दण्डित करने के लिए सरकार ने अधिनियम 1956 बनाया गया है।  बेगार का मतलब है बिना मेहनताने के कोई काम कराना यह अनुच्छेद बेगार के अलावा बलात श्रम  और बंधुआ मजदूरी पर रोक लगाता है। पर यह राज्य को अनुमति प्रदान करता है की सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा उदाहरण के तौर पर सैन्य सेवा या सामाजिक सेवा आरोपित कर सकती है।  अनुच्छेद 24 -किसी फैक्ट्री ,कारखाना  अथवा  अन्य संकटमय गतिविधियों यथा निर्माण कार्य एवं रेलवे में 14 वर्ष से कम  उम्र के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध करता है। बाल श्रम अधिनियम 1986 इस दिशा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कानून है। इसके अलावा बाल नियोज…

स्वतंत्रता का अधिकार/Rights Of Freedom (Indian Polity )-Indian Polity

स्वतंत्रता का अधिकार -इसका उल्लेख्य संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 19 से 22 तक उल्लेख्य है -;
अनुच्छेद 19 -यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को छह अधिकारों की गारंटी देता है जो इस प्रकार हैं -
वाक एवं अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता -यह प्रत्येक नागरिक को अभिब्यक्ति दर्शाने ,मत देने,विश्वास एवं अभियोग लगाने मौखिक लिखित स्वतंत्रता देता है जैसे -अपने या किसी अन्य के विचारों को प्रसार करने का अधिकार,प्रेस की स्वतंत्रता ,फ़ोन टैपिंग के विरुद्ध अधिकार,सरकारी गतिविधियों की जानकारी का अधिकार ,शांति का अधिकार,पर राज्य वाक् एवं अभिब्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगा सकता है अगर भारत की एकता एवं सम्प्रभुता ,राज्य की सुरक्षा ,अदि का हनन हो रहा हो।
शांतिपूर्वक सम्मलेन की स्वतंत्रता - किसी भी नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक संगठित होने का अधिकार है जिसमे शामिल है सार्वजनिक बैठक में भाग लेना ,इस स्वतंत्रता का उपयोग सार्वजनिक भूमि पर बिना हथियार के किया जा सकता है पर यह ब्यवस्था हिंसा या शांती भांग करने के लिए नहीं है। और इसमें हड़ताल का अधिकार शामिल नहीं है।
संघ बनाने का अधिकार -हर नागरिक को सभा,संघ,और सिमित गठि…

समानता का अधिकार/Right Of Equality अनुच्छेद 14 से 18 तक -Indian Polity

अनुच्छेद 14 -  इस अनुच्छेद में कहा गया है की राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी ब्यक्ति को किसी बिधि के समक्ष समता से या विधियों के सामान संरछण से वंचित नहीं करेगा ,फिर चाहे वह ब्यक्ति भारतीय नागरिक हो या विदेशी। कानून के समक्ष समानता का विचार ब्रिटिश मूल का है जबकि विधियों के समान संरक्षण अमेरिका के संविधान से लिया गया है। सरल शब्दों में कहे तो कानून के समक्ष सभी समान हैं चाहे वह अमीर हो या गरीब ,अधिकारी हो या सामान्य नागरिक।  उच्चतम न्यायालय ने ब्यवस्था दी की जहां सामान एवं असमान के बीच अलग अलग ब्योहार होता है वहाँ पर अनुच्छेद 14 लागू नहीं होता है।  विधि का शासन - विधि के समक्ष समानता विधि का  शासन के सिद्धांत का मूल तत्व है  इसकी कुछ अवधारणाएं हैं -इच्छाधीन शक्तियों की अनुपस्थिति अर्थात किसी भी ब्यक्ति को विधि के उल्लंघन के शिवाय दंडित नहीं किया जा सकता,कानून के समक्ष समानता आवश्यक है कोई ब्यक्ति अमीर,गरीब,ऊँच ,नीच,अधिकारी,गैरअधिकारी कोई कानून के ऊपर नहीं है,संविधान ब्यक्तिगत अधिकारों का परिणाम है जैसा की न्यायालय द्वारा इसे परिभासित और लागू किया जाता है।  समानता के अपवाद - कानून क…

मूल अधिकार /Fundamental Rights -Indian Polity

मूल अधिकार - संविधान के भाग तीन में अनुच्छेद 12 से 35 तक इसका उल्लेख्य है जोकि अमेरिकी संविधान से लिया गया है और संविधान के भाग तीन को अन्य उपनाम भारत के मैगनाकार्टा के नाम से जाना जाता है मूल अधिकार के सम्बन्ध में जितना विस्तृत विवरण हमारे देश के संविधान में है उतना अन्य किसी देश में नहीं मिलता। चाहे फिर अमेरिका ही हो। बिना किसी भेद भाव के हर ब्यक्ति के लिए मूल अधिकारों के सम्बन्ध में संविधान द्वारा गॉरन्टी दी गयी है,जिसमे हर ब्यक्ति के लिए समानता,स्वतंत्रता,सम्मान ,एकता को समाहित किया गया है,मूल अधिकार का मतलब लोकतंत्र के आदर्शों से है ये अधिकार राज्य के कठोर नियमों के खिलाफ नागरिकों की आजादी की सुरक्षा करते हैं। कानून बनाने के सन्दर्भ में तानासाही को सीमित करते हैं।  -मूलरुप से संविधान में सात अधिकार थे पर 44वें संविधान संसोधन के माध्यम से संपत्ति के अधिकार को हटाकर भाग 12 के अनुच्छेद 300 A के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया।  इस तरह सिर्फ 6 मूल अधिकार हैं।  मूल अधिकार की विषेशताएं -मूल अधिकार की कुछ विशेस्ताएं हैं जो इस प्रकार हैं - (1 )मूल अधिकार कुछ सिर्फ नागरिकों के लिए हैं जबकि कु…

नागरिकता /Citizenship -Indian Polity -Indian Polity

नागरिकता का महत्त्व -किसी भी अन्य आधुनिक राज्य की तरह भारत में भी दो तरह के लोग निवास करते हैं,नागरिक और विदेशी,भारतीय नागरिक राज्य के पूर्ण सदस्य होते हैं और उनकी इस पर पूरी निष्ठा होती है। इन्हे सारे समान्य और राजनितिक अधिकार प्राप्त होते हैं और दूसरी तरफ विदेशियों को किसी अन्य देश का नागरिक होने के कारण उन्हें उन्हें सभी नागरिक और राजनितिक अधिकार नहीं दिए जाते। और इसको दो भागों में बांटा गया है बिदेशी मित्र एवं शत्रु,मित्र वो होते हैं जिनके साथ भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं और सत्रु वे हैं जिनके साथ भारत के सम्बन्ध अच्छे न हों और युद्ध की स्थिति हो।  भारतीय नागरिकों को मिलने वाले विशेषाधिकार-हमारा संविधान हमें कुछ विशेष अधिकार देता है जोकि विदेशियों को नहीं मिलते हैं जोकि इस प्रकार हैं -धर्म,मूल,वंश,जाति,लिंग,या जन्म के आधार पर भेद भाव न करना जिसका उल्लेख्य अनुच्छेद 15 में है,सरकारी रोजगार के विषय में समानता अनुच्छेद 16 ,घूमने ,विचार व्यक्त करने,सम्मलेन,संघ,संचरण,कहीं भी निवेश,और ब्यवसाय करने की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 ,संस्कृत एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार,मतदान का अधिकार,चुनाव लड़ने का अधि…

संघ एवं इसका क्षेत्र /Union And Its territory -Indian Polity

संविधान के भाग एक के अनुच्छेद 1 से 4 तक में संघ एवं उसके क्षेत्र का उल्लेख्य है।  भारत राज्यों का संघ -अनुच्छेद 1 में उल्लेख्य है की भारत राज्यों का समूह न होकर राज्यों का संघ होगा इसका मतलब है की भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है जैसे की अमेरिका यहां पर राज्यों को संघ से अलग होने का कोई अधिकार नहीं है,भारत एक संघ है जो की अलग नहीं हो सकता। जिसे अनुच्छेद 1 के अंतर्गत तीन श्रेणी में बांटा गया है -राज्यों का क्षेत्र ,संघ क्षेत्र ,भारत सरकार द्वारा अधीग्रहीत किया जाने वाला क्षेत्र।  राज्यों एवं संघ शासित राज्यों के नाम और उनके क्षेत्र के विस्तार का उल्लेख्य संविधान की पहली अनुसूची में है इस समय 28 राज्य और 9 केंद्रशासित राज्य हैं  जिसमे  राज्यों के लिए संविधान के भाग 21 के अंतर्गत विशेष उपबंध है। एक संप्रभु राज्य होने के नाते भारत अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत विदेशी क्षेत्र का भी अधिग्रहण कर सकता है।  अनुच्छेद 2 -इसके तहत संसद को शक्ति दीं गयी है कि संसद कानून के द्वारा ऐसी शर्तों पर जो वह ठीक समझे संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है ,अनुच्छेद 2 स…