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संविधान की मूल संरचना /Basis Structure Of The Constitution (Indian Polity ) एम. लक्ष्मीकांत

संविधान  की मूल संरचना- संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद मौलिक अधिकारों में संसोधन कर सकती है या नहीं यह मामला संविधान लागू होने के एक वर्ष बाद सर्वोच्च न्यायालय के सामने आ गया , जिसके तहत उच्चतम न्यायालय ने एक नया सिद्धांत दिया संविधान की मूल संरचना का जिसने ब्यवस्था दी की अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद के संवैधानिक अधिकार उसे संविदान की मूल संरचना को बदलने की शक्ति नहीं देते जिसका अर्थ यह है की संसद मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती और मूल अधिकारों को वापस नहीं ले सकती जो संविधान के मूल संरचना से जुड़े हों। संविधान ने संसद को सीमित संसोधनकारी शक्ति दी है इसलिए उस शक्ति का उपयोग करते हुए संसद इसे निरंकुशता तक नहीं बढ़ा सकती वास्तव में संसद की सीमित संसोधनकारी शक्ति संविधान की मूल विषेशताओं मे से एक है अतः इसको समाप्त नहीं किया जा सकता संसद अनुछेद 368 के अंतर्गत अपनी संसोधनकारी शक्ति को विस्तारित कर निरस्त करने का अधिकार हांसिल नहीं कर सकती। 
मूल संरचना के तत्व - संविधान के मूल संरचना के अंतर्गत आने वाले उपबंध जो इस प्रकार है -;
संविधान की सर्वोचता एवं संविधान का धर्म निरपेछ चरित्र। 
भारतीय राजनीति की सार्वभौम एवं लोकतान्त्रिक तथा गणराज्यात्मक प्रकृत। 
विधायिका ,कार्यपालिका,एवं न्यायपालिका के बीच शक्ति का विभाजन। 
संविधान का संघीय स्वरुप एवं राष्ट्र की एकता अखंडता। 
कल्याणकारी राज्य एवं न्यायिक समीक्षा। 
वैक्तिक स्वतंत्रता एवं गरिमा एवं  संसदीय प्रणाली और कानों का शासन। 
मौलिक अधिकार एवं निति निर्देशक सिद्धांतों के बीच संतुलन। 
समत्व का सिद्धांत एवं स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं न्याय तक प्रभावी पहुँच। 
संविधान संसोधन की संसद की सीमित शक्ति। 

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