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अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

निर्वाचन आयोग /Election Commission- Indian Polity

निर्वाचन आयोग - निर्वाचन आयोग स्थाई एवं स्वतंत्र संगठन है जिसका गठन भारत के संविधान द्वारा देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सम्पन कराने के लिए किया गया था अनुच्छेद 324 के अनुसार संसद,राज्य विधानमंडल,राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति आदि का निर्वाचन संपन्न कराने  की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है जोकि अखिल भारतीय संस्था है क्यूंकि यह केंद्र एवं राज्य सरकार दोनों के लिए समान है।  संगठन संरचना- निर्वाचन आयोग एक बहुसदस्यीय संगठन है जिसमे एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं दो अन्य निर्वाचन आयुक्त होते हैं यानि की कुल तीन जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है और जब कोई अन्य निर्वाचन इस प्रकार नियुक्त किया जाता है उस समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त अध्यक्ष के रूप में काम करता है।  राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की सलाह पर प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्ति कर सकता है और निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्तों का निर्धारण रास्ट्रपति के द्वारा किया जाता है तीनों आयुक्तों के पास समान शक्तियां होती हैं और इनके वेतन भत्ते आदि एक समान होते हैं।  निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 की उम्र तक का होता है जो भी पहल…

आधीनस्थ न्यायालय/Subordinate Courts-Indian Polity

आधीनस्थ न्यायालय - राज्य की न्यायपालिका में एक उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय होते हैं जिन्हे अधीनस्थ न्यायालय कहने का मुख्य कारण  इनका उच्च न्यायालय के आधीन होना है संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 223 से 237 तक इन न्यायालयों के सगठन एवं कार्यपालिका से स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का वर्णन किया गया है  जिला न्ययाधीशों की नियुक्ति - इनकी नियुक्ति राज़्यपाल के द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श की जाती है जिसे न्यायाधीश चुना जाना है वह केंद्र या राज्य सरकार में किसी सरकारी सेवा में कार्यरत ना हो ,7 वर्ष का अधिवक्ता के तौर पर अनुभव हो ,और उसके नियुक्ति की सिफारिश उच्च न्यायालय ने की हो। इनके नियुक्ति पदस्थापना,पदोन्नति आदि पर नियंत्रण उच्च न्यायालय का होता है।  जिला न्यायाधीश के अंतर्गत नगर दीवानी न्यायाधीश,अपर जिला न्यायाधीश,संयुक्त जिला न्यायाधीश, आदि आते हाँ।  संरचना एवं अधिकार क्षेत्र - राज्य द्वारा अधीनस्थ न्यायिक सेवा की संगठनात्मक एवं संरचना का निर्धारण किया जाता है पर एक राज्य से दुसरे राज्य में इसकी प्रकित अलग हो सकती है उच्च न्यायालय से नीचे इनके तीन स्तर होते हैं जिसमे जिला का न्या…

उच्च न्यायलय/High Court-Indian Polity

उच्चतम न्यायालय - भारतीय एकल न्यायिक ब्यवस्था में उच्च न्यायालय का स्थान उच्चतम न्यायालय के बाद आता है एवं अधीनस्थ न्यायालयों के ऊपर आता है लेकिन राज्य में इसकी स्थिति सर्वोच्च होती है। भारत में उच्च न्यायालय का गठन सबसे पहले 1962 में हुआ था जिसके तहत कलकत्ता ,बम्बई,और मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना की गयी और 1866 में अल्लाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना हुई इस समय देश में 24 उच्च न्यायालय एवं 4 साझा उच्च न्यायालय हैं। संघ क्षेत्रों में केवल दिल्ली ही ऐसा राज्य है जिसका अपना  उच्च न्यायालय है।  संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायलय के गठन ,शक्तियों आदि का उल्लेख्य किया गया है  उच्च न्यायालय का संगठन- प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और उतने न्यायाधीश होते हैं जितने राष्ट्रपति निर्धारित करता है इस तरह संवधन में न्यायाधीशों की संख्या का उल्लेख्य ना कर राष्ट्रपति के विवेक पर छोड़ दिया गया है जिसे राष्ट्रपति कार्य आवस्यकतानुसार निर्धारित करता है।  न्यायधीशों की नियुक्ति - उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है पहले उच्च न्या…

राज्य मंत्रिपरिषद /State Council Of Manister-Indian Polity

राज्य मंत्रिपरिषद -  भारतीय संविधान केंद्र के समान राज्य में संसदीय ब्यवस्था का उपबंध करता है जिसमे राज्य की राजनीतिक एवं प्रशासनिक ब्यवस्था का वास्तविक कार्यकारी मंत्रिपरिषद का मुखिया यानि की मुख्यमंत्री होता है संविधान में इसके बारे में अनुच्छेद १६३ और १६४ में उल्लेख्य है जिसमे अनुच्छेद 163 में राज्य मंत्रिपरिषद की स्थिति के बारे में बताया गया है जबकि अनुच्छेद 164 में मंत्रियों के वेतन भत्ते  उल्लेख्य किया गया है।  अनुच्छेद 163 में यह उल्लेख्य है की राज़्यपाल को उन बातों के लिए छोड़कर जिसमे वह स्वविवेक से निर्णय ले सकता है उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका मुखिया मुख्यमंत्री होगा।  अगर सवाल उठता है की कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके सबंध में राज़्यपाल द्वारा अपेक्षित है की अपने विवेक के अनुसार कार्य करे तो उसके द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम होगा।  अनुच्छेद 164 में उल्लेख्य किया गया है की मुख्यमंत्री की नियुक्ति राजयपाल करेगा एवं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री के परामर्श से करेगा।  राज्यों में मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की संख्या विधानसभा के कुल सदस्य संख्या का 15% हो…

मुख्यमंत्री/Chief Manister And His Power-Indian Polity

मुख्यमंत्री - संविधान द्वारा निर्धारित किया गया है की सरकार की संसदीय ब्यवस्था में राज़्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है जबकि मुख्यमंत्री कार्यकारी प्रमुख होता है ,इस तरह राज्य में मुख्यमंत्री की स्थिति वही होती है जो केंद्र में प्रधानमंत्री की।  मुख्यमंत्री की नियुक्ति - संविधान में मुख्यमंत्री के निर्वाचन के बारे में कोई विशेष उल्लेख्य नहीं किया गया है सिर्फ अनुच्छेद 164 में कहा गया है की मुख्यमंत्री की नियुक्ति राजयपाल करेगा पर इसका मतलब ये नहीं है की राज़्यपाल किसी को भी मुख्यमंत्री नुक्त कर सकता है संविधान के अनुसार वह राज्य विधानसभा के चुनाव में बहुमत प्राप्त दल के ही नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकता है लेकिन अगर किसी दल को बहुमत ना मिला हो तो राज़्यपाल अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है और राज्य के सबसे बड़े दल या दलों के समूह को सरकार बनाने के लिए कह सकता है जो बहुमत सिद्ध करने का दावा  करता हो जिसे इसके लिए एक माह का समय दिया जाता है।  ऐसे ब्यक्ति को भी मुख्यमंत्री नियुक्त किया जा सकता है 6 माह के लिए जो राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं है लेकिन इस दौरान उसे विधानमंडल क…

राज़्यपाल/Know Anything About Governor -Indian Polity

राज़्यपाल - हमारे संविधान में राज्य सरकार के लिए उसी तरह ब्यवस्था की गयी है जैसे केंद्र के लिए जिसे संसदीय ब्यवस्था कहते हैं जिसका उल्लेख्य संविधान के छठे भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका का उल्लेख्य किया गया है ,जिसमे शामिल होते हैं राज़्यपाल ,मुख्यमंत्री,मंत्रिपरिषद ,एवं राज्य महाधिवक्ता।  राज़्यपाल राजयका कार्यकारी प्रमुख होता है जोकि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है इस तरह राज़्यपाल दोहरे भूमिका का निर्वाहन करता है।  आमतौर पर सभी राज्य के लिए राज़्यपाल होते हैं पर एक ब्यक्ति दो या इससे अधिक राज्यों के लिए नियुक्त किया जा सकता है।  नियुक्ति- इसका निर्वाचन ना तो सीधे जनता द्वारा न अप्रत्यक्ष रूप से होता है इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति के मोहर लगे नियुक्तिपत्र द्वारा होती है जोकि केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत होता है पर यह राज्य में राज़्यपाल का कार्यालय केंद्र  आधीन नहीं है यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है। संविधान में राज़्यपाल के नियुक्ति हेतु दो योग्ताएं निर्धारित की गयी हैं भारत का नागरिक हो,और 35 की आयु पूरी कर चूका हो इसके साथ कुछ और शर्तें हैं जैसे की …

जनहित याचिका/Public Intrest Litigation-Indian Polity

जनहित याचिका -   सबसे पहले ये जानते हैं की ये हमारी  न्यायिक ब्यवस्था में कहाँ से आया  जवाब है अमेरिका से अमेरिका में इसे प्रतिनिधित्वविहीन समूहों के हित  के लिए इसे लाया गया लेकिन भारत में जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय के न्यायिक सक्रियता से उत्पादित हुआ है जिसकी शुरुआत 1980 में हुई और इसकी शुरुआत करने में वी. आर. कृष्ण अय्यर एवं पी एन भगवती ने अहम् भूमिका निभाई। जिसे सामाजिक क्रिया याचिका के रूप में भी जाना जाता है।  जनहित याचिका का अर्थ- इसकी शुरुआत पारम्परिक अधिकारिता के शासन एवं नियमों में छूट से शुरू हुई इस क़ानून के अनुसार केवल वही ब्यक्ति संवैधानिक उपचार हेतु न्यायालय जा सकता है जिसके अधिकारों का हनन हुआ है पर जनहित याचिका के मामले में ऐसा नहीं है जनहित याचिका के अंतर्गत कोई भी जनभावना वाला ब्यक्ति या सामजिक संगठन किसी भी ब्यक्ति या ब्यक्तियों के समूह को न्याय दिलाने के लिए न्यायालय जा सकता है यदि वह ब्यक्ति या समूह निर्धनता ,अज्ञान या अपनी सामाजिक या आर्थिक स्थिति के कारण उपचार के लिए न्यायालय नहीं जा सकता है। इस तरह जनहित याचिका में एक ब्यक्ति अपने इच्छा के आधार पर ही अन्य ब्…

न्यायिक सक्रियता /Judicial Activism-Indian Polity

न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)- न्यायिक सक्रियता की शुरुआत अमेरिका से हुई और भारत  में न्यायिक सक्रियता का सिद्धांत 1970 के मध्य में आया जिसे लाने का श्रेय वी आर. कृष्ण अय्यर ,पी. एन. भगवती ,ओ. चिन्नप्पा रेड्डी ,और डी.ए. देसाई को है।  न्यायिक सक्रियता का मतलब - न्यायिक सक्रियता का मतलब नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए तथा समाज में न्याय को बढ़ावा देने के लिए न्यायपालिका द्वारा  आगे बढ़कर भूमिका लेने से है दुसरे सब्द में इसका अर्थ है न्यायपालिका द्वारा सरकार के अन्य दो अंगों को अपने संवैधानिक दायित्वों के पालन हेतु बाध्य करना है।  न्यायिक सक्रियता को न्ययिक गतिशीलता कहते हैं जोकि न्यायिक संयम के बिलकुल बिपरीत है जिसका मतलब है न्यायपालिका द्वारा आत्मनियंत्रण  बनाये रखना न्यायिक सक्रियता न्यायिक शक्ति के उपयोग का एक तरीका है जोकि न्यायाधीश को प्रेरित करता है की वह सामान्यरूप से सख्त न्यायिक प्रक्रियायों एवं पूर्व नियमों को नयी सामाजिक नीतियों के पक्ष में त्याग दे।  न्यायिक सक्रियता न्यायपालिका का वह चलन है जिसमे ब्यक्तिगत अधिकारों को ऐसे निर्णयों द्वारा संरक्षित और बढ़ाया जाता …

न्यायिक समीक्षा/Judicial Review -Indian Polity

न्यायिक समीक्षा- न्यायिक समीक्षा की उत्पत्ति एवं विकाश अमेरिका में हुआ था जिसका प्रतिपादन अमेरिका में पहली बार मारबरी बनाम मैडिसन के जटिल मुद्दों पर हुआ था लेकिन भारत के मामले में भारतीय संविधान खुद न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति देता है। और न्यायिक समीक्षा की शक्ति उच्चतम एवं उच्च न्यायालय को प्राप्त है और उच्चतम न्यायालय ने घोषित कर रखा है की न्यायिक समीक्षा की शक्ति न्यायपालिका की शक्ति संविधान की मूल विशेस्ता है। इसलिए न्यायिक समीक्षा की शक्ति को संविधान संसोधन के भी द्वारा काम या समाप्त नहीं किया जा सकता है।  न्यायिक समीक्षा का मतलब- न्यायिक समीक्षा विधि अधिनियमों तथा कार्यपालिका आदेशों की संवैधानिकता की जांच की न्यायपालिका की शक्ति है  जिकी केंद्र एवं राज्य शरकारों पर लागू होती है अगर परिक्षण  के बाद पाया जाता है की संविधान का उल्लंघन हो रहा है तो उन्हें अमान्य या असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है जिसे सरकार लागू नहीं कर सकती है।  इसे तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है -;संविधान संसोधन की न्यायिक समीक्षा ,संसद द्वारा  पारित नए कानूनों की समीक्षा ,संघ एवं राज्य के आधीन अ…

उच्चतम न्यायालय/Supreme Court-Indian Polity(IAS,PCS,SSC)

उच्चतम न्यायालय - भारतीय संविधान ने एकीकृत न्याय ब्यवस्था की स्थापना  की है जिसमे सबसे ऊपर स्थान उच्तम न्यायालय का फिर उच्च न्यायलय का उसके बाद अधीनस्थ न्ययालय आते हैं।  संविधान के भाग पांच के अनुच्छेद 124 से 147 तक इसके गठन स्वतंत्रता ,न्यायक्षेत्र शक्तियां आदि का उल्लेख्य किया गया है।  उच्चतम न्यायालय का गठन - इस समय उच्चतम न्यायालय में 34 न्यायाधीश हैं एक मुख्य और 33 अन्य न्यायधीश हैं जिनकी नियुक्ति  राष्ट्रपति करता है  न्यायधीश की नियुक्ति राष्ट्पति वरिष्ठता एवं अन्य न्यायधीश और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों के परामर्श से करता है और अन्य न्यायधीशों के नियुक्ति में मुख्य न्यायधीश की सलाह लेता है।  योग्यता-  उच्चतम न्यायालय का न्यायधीश बनने के लिए कुछ योग्यताओं का निर्धारण किया गया है  प्रकार हैं -; उसे भारत का नागरिक होना चाहिए,किसी उच्च न्यायालय का कम से कम पांच साल के लिए न्यायधीश होना चाहिए ,उचतम न्यायालय एवं बिभिन्न न्यायालयों में मिलाकर 10 शाल तक वकील रह चूका हो ,राष्ट्रपति के मत में सम्मानित न्यायवादी होना चाहिए।  इसके बाद नियुक्ति से पहले न्यायाधीशों को राष्ट्रपति के सामने सप…

संसदीय सिमितियाँ /Parliamentary Committees -Indian Polity

संसदीय सिमितियाँ - संसद एक बहुत बड़ी संस्था है जोकि अपने समक्ष  लाये गए मामलों का प्रभावी रूप से स्वयं निपटारा नहीं कर सकती है संसद के कई और कठिन एवं पर्याप्त समय ना होने के कारण अनेक सिमितियों का गठन उसकी मदत के लिए किया जाता है जोकि संसदीय काम काज को प्रभाविरूप से करने में उसकी मदत करती हैं।  इनके गठन एवं कार्यकाल का कोई विशेष प्रावधान नहीं है इन सब मामलों में संसद के दोनों सदनों के नियम ही प्रभावी होते हैं इस प्रकार संसदीय सिमित यह सिमित होती है जो सदन  द्वारा नियुक्त एवं निर्वाचित होती है जिसके सदस्यों को लोकसभा अध्यक्ष एवं सभापति नामित करते हैं ,और इनके निर्देशनुसार कार्य करती है ,सिमितियाँ अपनी रिपोर्ट सदन को या लोकसभा अध्यक्ष या सभापति को सौंपती हैं।  सिमितियों का वर्गीकरण - आमतौर पर संसदीय सिमितियाँ दो प्रकार की होती हैं स्थाई एवं तदर्थ यानी अस्थाई स्थाई सिमितियाँ स्थाई होने की वजह से निरंतरता के साथ काम करती हैं जिनका गठन हर वर्ष किया जाता है वहीँ अस्थाई सिमितियाँ जिस प्रयोजन से इनका गठन किया जाता है प्रयोजन समाप्त होते ही खुद ब खुद समाप्त हो जाती हैं।  लोकलेखा सिमित- इसका गठ…

राज्य सभापति एवं उप सभापति -Indian Polity

राजयसभा का सभापति - राजयसभा का पीठासीन अधिकारी सभापति कहलाता है जोकि देश का उपराष्ट्रपति होता है लेकिन जब रुपरस्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में काम करता है तब वह राजयसभा का सभापति नहीं रहता है और इसे तभी पद से हटाया जा सकता है जब उपराष्ट्रपति के पद से हटा दिया जाए राजयसभा में सभापति की शक्ति उसी प्रकार है जैसे लोकसभा अध्यक्ष पर लोकसभा के पास दो अन्य शक्तिया होती हैं जो सभापति के पास नहीं हैं।  (1)कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं यह तय करने की शक्ति सिर्फ लोकसभा अध्यक्ष को है  (2)संसद के संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।  अध्यक्ष की तरह सभपति अपने सदन का सदस्य नहीं होता है लेकिन अध्यक्ष के तरह सभापति भी पहली बार मत नहीं दे सकता पर मत बराबरी होने की स्थिति में निर्णायक मत दे सकता है।  लेकिन जब उपराष्ट्रपति को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो उस स्थिति में वह राजयसभा का सभापति नहीं रहेगा लेकिन वह सदन में मौजूद रह सकता है बोल और सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है लेकिन मत नहीं दे सकता जबकि लोकसभा अध्यक्ष लोकसभा सदस्य के तौर पर मत दे सकता है पर सभापति राजयसभा का सदस्य नहीं होता ह…

लोकसभा अध्यक्ष/About Loksabha Speaker (IAS,PCS,SSC)

लोकसभा अध्यक्ष -; पहली बैठक के बाद उपस्थित लोकसभा सदस्यों के बीच से अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है और इसकी तारीख राष्ट्रपति निर्धारित करता है आमतौर पर अध्यक्ष लोकसभा के जीवनकाल तक पद धारण करता है पर कुछ मामलों में पहले भी समाप्त हो सकता है।  (1 )यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता है (2)यदि वह उपाध्यक्ष को सम्बोधित कर पद त्याग करे।  (3)यदि लोकसभा के सभी सदस्य बहुमत से पारित संकल्प द्वारा उसे उसके पद से हटाएं लेकिन ऐसा संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जायेगा जब तक की उस संकल्प को प्रस्तावित करने के  से पूर्व 14 दिन का अग्रिम नोटिस दे दिया गया हो।  जब अध्यक्ष को हटाने का संकल्प विचाराधीन है तो अध्यक्ष  पीठासीन नहीं होगा पर उसे लोकसभा में बोलने,और उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होगा इस स्थिति में वह मत भी दे सकता है पर मत बराबरी की स्थिति में नहीं।  लोकसभा बिघटित होने क बाद भी  अध्यक्ष अपने पद पर बना रहता है  वह नयी लोकसभा की बैठक तक पद धारण किये रहता है।  शक्ति एवं कार्य - अध्यक्ष लोकसभा एवं उसके सदस्यों का मुख्या होता है एवं सदस्यों की शक्ति और विशेषाधिकार का अभिभावक होता है सदन का म…

संसद (लोकसभा का गठन)Parliament(Constitution Of Loksabha) -Indian Polity (IAS,PCS,SSC)

संसद (लोकसभा का गठन)- लोकसभा की अधिकतम संख्या 552 निर्धारित की गई है जिसमे 530 राज्यों के प्रतिनिधि एवं 20 संघ राज्यों से होते हैं और दो राष्ट्रपति द्वारा एंग्लो इंडियन सदस्य मनोनीत होते हैं।  वर्त्तमान में लोकसभा सदस्यों की संख्या 545 है जिसमे 530 सदस्य राज्यों से एवं 13 सदस्य संघ राज्यों से और दो राष्ट्रपति द्वारा  मनोनीत।  लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधि राज्यों के बिभिन्न निर्वाचन क्षेत्रो के लोगों के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं और भारत के हर नागरिक को जिसकी उम्र 18 वर्ष की हो चुकी हो मतदान करने का अधिकार है और यही प्रक्रिया द्वारा संघ राज्यों से भी प्रतिनिधि चुने जाते हैं।  अगर एंग्लो इंडियन समुदाय का लोकसभा में प्रतिनिधित्व ना हो तो दो सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित किये जाते हैं।  चुनाव प्रणाली - प्रत्यक्ष मतदान कराने के लिए सभी राज्यों को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र में विभाजित किया जाता है और इस सबंध में संविधान में दो उपबंध किये गए हैं  (1)लोकसभा में सीटों का बंटवारा प्रत्येक राज्य को ऐसे नियम से किया जायेगा की स्थानों की संख्या से उस राज्य की जनसँख्या का अनुपा…

संसद एवं उसका गठन /Prliament-Indian Polity(IAS,PCS,SSC)

संसद एवं उसका गठन - संसद केंद्र का विधाई अंग है और यह भारतीय लोकतंत्र में विशिस्ट स्थान रखती है और इसका उल्लेख्य संविंधान के भाग 5 के अनुच्छेद 79 से 122 तक है जिसमे इसके गठन,संरचना ,और शक्तियों की बात की गयी है।  भारतीय संसद के तीन अंग हैं -राष्ट्रपति,लोकसभा,राजयसभा,जिसंव राज्य सभा को उच्च सदन एवं लोकसभा को निचला सदन कहते हैं राजयसभा में संघ एवं राज्यों के प्रतिनिध होते हैं और लोकसभा सम्पूर्ण देश का प्रतिनिधित्व करती है। राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य न होकर भी संसद का महत्वपूर्ण अंग है क्यूंकि संसद द्वारा पारित कोई भी अधिनियम क़ानून तभी बन सकता है जब राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देदे उसके साथ राष्ट्रपति संसद का सत्र आहूत एवं सत्रावसान करता है ,लोकसभा को विघटित करने के आलावा संसद का सत्र न चलने पर अध्यादेश जारी कर सकता है।  राजयसभा -; राजयसभा की अधिकतम संख्या 250 है जिसमे 238 सदस्य राज्यों एवं संघ क्षेत्रों से एवं 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत होते हैं औरइनका चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है।  वर्त्तमान सदस्य संख्या -245 है जिसमे 229 राज्यों से 4 संघ क्षेत्र (दिल्ली एवं पुडुचे…

मंत्रिमंडलीय सिमितियाँ/Cabinet Committees-Indian Polity(ias,Pcs,Ssc)

मंत्रिमंडलीय सिमितियाँ - मंत्रिमंडलीय सिमितियाँ गैर संवैधानिक होती हैं और ये दो प्रकार की होती हैं स्थाई एवं तदर्थ जो अस्थाई होती हैं इनका गठन समय समय आवस्यकता अनुसार किया जाता है और कार्य संपन्न होने पर इनका बिघटन कर दिया जाता है और इनका गठन प्रधानमंत्री के द्वारा किया जाता है और इनकी संख्या समय के साथ बदलती रहती है।  आमतौर पर इनकी सदस्य संख्या तीन से आठ तक हो सकती है और इसके सदस्य कैबिनेट मंत्री होते हैं लेकिन गैर कैबिनेट भी हो सकते हैं और सिमित के प्रमुख आम तौर पर प्रधानमंत्री होते हों पर कभी कभी गृहमंत्री या वित्तमंत्री भी हो सकते हैं लेकिन अगर प्रधानमंत्री उस सिमित का सदस्य है तो वही सिमित की अध्यक्षता करेगा।  सिमितियाँ मुद्दों का हल तलाशने के साथ साथ मंत्रिमण्डल के विचार हेतु प्रस्ताव बनाती हैं और निर्णय लेती हैं पर मंत्रिमंडल इनके निर्णयों की समीक्षा कर सकता है ,सिमितियाँ मंत्रिमंडल के कार्य की अधिकता को कम करती हैं।  महत्वपूर्ण सिमितियाँ- चार अत्यधिक महत्वपूर्ण सिमितियाँ हैं जिनका यहां पर उल्लेख्य किया जा रहा है जो इस प्रकार हैं -; (1)राजनितिक मामलों की सिमित राजनीतिक परिस्थि…

पुर्तगालियों का भारत में आगमन -Indian Modern History(IAS,PCS,SSC)

भारत में यूरोपियों का आना कैसे हुआ -; 15वीं ईसवी से लेकर 19वीं तक यूरोप में आर्थिक  परिवर्तन का काल माना जाता है ये वही  दौर था जब लोग कृषि से बिनिर्माण की ओर अग्रसर हो रहे थे और मशीनो का प्रयोग बढ़ रहा था मतलब हम कह सकते हैं की औद्योगिक पुनर्जागरण का काल था और साथ ही साथ प्रतियोगिता बढ़ती जा रही थी। और 15वीं सदी में यूरोपीय शक्तियां नए विकल्प और क्षेत्रों की तलाश शुरू कर दी और इस दौरान कैसे और कौन कौन यूरोपीय भारत में आये हम उसकी बात करेंगे तो सबसे पहले पुर्तगाली भारत आये।  पुर्तगालियों का भारत में आगमन -; पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने 17 मई 1498 को भारतीय मार्ग की खोज की और कलकत्ता पहुंचा और अपनी समुद्री शक्ति की वजह से भारतीय क्षेत्रों में प्रभाव  छोड़ा भारत में इनका आने का उद्देश्य तो ब्यापार करना था पर इनका छुपा हुआ मकसद ईशाई धर्म का प्रचार करना और उसमे परिवर्तित करना था और अरब को बाहर निकालकर ब्यापार पर एकाधिकार  प्राप्त करना था।  भारत की स्थिति -जिस समय पुर्तगालियों का भारत में आगमन हुआ उस समय गुजरात के आलावा समस्त भारत टुकड़ों में बिभक्त था और ऐसी कोई शक्ति नहीं थी जिसके पास नौस…

केंद्रीय मंत्रिपरिषद /Central Council Of Ministers -Indian Polity(IAS,PCS,SSC,)

केंद्रीय मंत्रिपरिषद -; भारतीय संविधान की संसदीय ब्यवस्था ब्रिटिश मॉडल पर आधारित है जिसमे मुख्य कार्यकारी मंत्रिपरिषद होती है जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होता है संविधान में इसके बारे में ज्यादा कुछ उल्लेख्य नहीं है पर संविधान के दो अनुच्छेद 74 और 75 में इसका संछिप्त वर्णन दिया गया है जिसमे अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद और अनुच्छेद 75 मंत्रियों के कार्यकाल,उत्तरदाईत्व,वेतन,भत्ते आदि से सम्बंधित है।  अनुच्छेद 74 - यह उल्लेख्य करता है की राष्ट्रपति की सलाह हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के परामर्शनुसार कार्य करेगा लेकिन एक बार राष्ट्रपति चाहे तो मंत्रिपरिषद से पुनःविचार हेतु कह सकता है पर दूसरी बार सलाह मानने के लिए बाध्य है ,मंत्रियों द्वारा दी गयी राष्ट्रपति को सलाह किसी न्यायालय में जांच योग्य नहीं है।  अनुच्छेद 75 -; इसमें उल्लेख्य है की प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य  मंत्रियों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा ,प्रधानमंत्री सहित कुल मंत्रियों की संख्या कुल लोकसभा सदस्य के 15% से ज्यादा नहीं होगी ,अगर किसी सदन क…

प्रधानमंत्री /Prime Minister -Indian Polity

प्रधानमंत्री - ; संसदीय ब्यवस्था में राष्ट्रपति केवल नाम मात्र का प्रधान होता है जबकि वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के पास होती है दुसरे शब्दों में हम कह सकते हैं की राष्ट्रपति राज्य प्रमुख और प्रधानमंत्री कार्यकारी प्रमुख होता है।  प्रधानमंत्री की नियुक्ति -; संविधान में किसी विशेष प्रक्रिया का उल्लेख्य नहीं किया गया है प्रधानमंत्री के नियुक्ति के बारे में पर अनुच्छेद 75 केवल इतना बताता है की राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेगा पर इसका मतलब कत्तई नहीं है की राष्ट्रपति किसी को प्रधानमंत्री नियुक्त कर सकता है। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है पर किसी दल  के बहुमत में ना होने पर राष्ट्रपति अपने विवेक का इस्तेमाल कर सबसे  बड़े दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है और एक महीने के अंदर सदन में बहुमत साबित करने को कहता है।  एक ब्यक्ति किसी भी सदन का सदस्य ना हो फिर भी प्रधानमंत्री बन सकता है पर 6 महीने के अंदर संसद के किसी भी सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होगी।  कार्यकाल- प्रधामंत्री को राष्ट्रपति सपथ दिलाता है जिसमे वह अपने पद के…